mahabharat

                              यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत: |

                              अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

                              परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।

                              धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥ 

mahabharat ( महाभारत )

mahabharat- mahabharat ki full story k liye pora artical padhe(videos) में समय हूँ | mahabharat की अमर कथा सुनाने जा रहा हूँ |  महाभारत  केवल भरत वंश की कोई सीधी-सादी युद्ध कथा नहीं है यह कथा है भारतीय संस्कृति के उतार-चढ़ाव की यह कथा है | सत्य और असत्य के महायुद्ध की यह कथा है | अंधेरे से जूझने वाले उजाले की और यह कथा मेरे सिवा  कोई दूसरा सुना भी नहीं सकता |                                                           

                          क्योंकि मैंने (समय) इस कथा को इतिहास की तरह गुजरते हुए देखा है इसका हर पात्र मेरा(समय)  देखा हुआ है | इसकी हर घटना मेरे सामने घटी है | मैं ही दुर्योधन हूं | मैं ही अर्जुन और मैं ही कुरुक्षेत्र | क्योंकि महाभारत बनते बिगड़ते रिश्ते और रिश्तो के आधार और जीवन सागर को मथ कर जीवन के तत्व और सत्य का अमृत  काढ़ने की कहानी भी है | और यह लड़ाई हर युग को अपने-अपने कुरुक्षेत्र में लड़नी पड़ती है

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                         क्योंकि हर युग के सत्य को वर्तमान असत्य से जूझना पड़ता है और जब तक मैं हूं यह महायुद्ध चलता रहेगा और मेरा कोई अंत नहीं मैं अनंत हूं इसलिए यह आवश्यक है कि हर वर्तमान इस कहानी को सुने और  बुने ताकि वह भविष्य के लिए तैयार हो सके यह लड़ाई लड़ना हर  वर्तमान का कर्तव्य है और हर भविष्य की तकदीर

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                         इसलिए मैं कभी गुरु कभी मां और कभी ऋषि बनकर हर  नई पीढ़ी को इस कहानी द्वारा उसे अपने इस महायुद्ध के लिए तैयार करता रहता हूं यह कहानी वास्तव में उस दिन शुरू नहीं हुई जिस दिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता उपदेश दिया था यह कहानी जिस दिन द्रोपदी ने दुर्योधन का मजाक उड़ाया था यह कहानी उन घटनाओं से बहुत पहले दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र चक्रवर्ती महाराज भरत के विजय यात्रा से लौटने पर हस्तिनापुर राज्य दरबार में शुरू होती है   

   

* भरत क्यों (why) अपने पुत्रों को राजा नहीं बनाया ?
* भरत की माँ का पालन पोषण किसने किया था ?
प्रश्नो के उत्तर के लिए स्टोरी आगे पढ़े 

                 भरत  की बड़ाई केवल इसलिए नहीं कि उसने हस्तिनापुर  राज्य की सीमाएं हिमालय से सागर तक फैला दी थी और हमारा यह महान देश उसी का नाम लेकर भारत वर्ष कहलाया महाराज भरत की बड़ाई इसमें भी है कि उन्होंने ठीक अपने राज दरबार की मिट्टी में प्रजातंत्र का पहला बीज  डाला और जन्म और कर्म के बीच में एक रेखा डालकर यह कहा कि जीवन का अर्थ जन्म नहीं कर्म है क्योंकि कुरुक्षेत्र वास्तव में धर्म क्षेत्र है  

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महामंत्री – महाराज की जय हो आज हस्तिनापुर की सीमाएं हिमालय से लेकर कुमारी अंतरीप  तक फैल चुकी हैं आर्यवर्त 

भारतवर्ष कहलाने लगा है महाराज समय आ गया है कि आप अपने युवराज नियुक्त  कर दें 

महाराज महामंत्री यह घोषणा चंद्रवंशी की पूर्णिमा समारोह में की जाएगी

शकुंतला – सुनो तुम कहीं जा रहे हो पुत्र      

महाराज – हाँ माते  युद्ध से लौटा हूं सोचा मैं महर्षि  के दर्शन कर लूँ  

शकुंतला – उन्हें महा ऋषि नहीं नाना कहो पुत्र मैं उनकी पुत्री तो नहीं परंतु मेरा पालन-पोषण उन्होंने किया है मेरी ओर से भी उनके चरण छू लेना और उनसे कहना वह अपनी पुत्री शकुंतला को तो भूल ही गए    

भरत – अवश्य माते  आज्ञा  दें 

शकुंतला – चिरंजीवी भवः   

ऋषि – आओ  शकुंतला पुत्र

भरत –  प्रणाम महर्षि    

ऋषि – आशीष    शकुंतला कैसी है वत्स   

भरत – स्वस्थ ऋषिवर  उनका प्रणाम तो हमेशा आपके चरणो में रहता है परंतु यह कहलवाया है पिता श्री तो जैसे पुत्री को भूल ही गए हैं  

ऋषि – अब तू   वह पूछ ले जो  पूछने आया है      

भरत – समस्या यह है कि मैं तो 9 पुत्र का पिता हूं परंतु युवराज किसे बनाऊ  ऋषिवर    

ऋषि – इस प्रश्न का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी पर विजय पाने वाले भरत ने अभी तक स्वयं में विजय नहीं पाई और यदि तुम स्वयं  मैं विजय नहीं पाओगे तो न्याय ही नहीं कर सकोगे इसलिए जाओ स्वयं पर विजय पाओ तुम्हें उत्तर मिल जाएगा मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है चिरंजीवी भवः 

हस्तिनापुर चंद्रवंशी के प्रताप से जगमग आ रहा है और आज राज दरबार मैं इतिहास स्वयं साँस रोके  खड़ा है और उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा है जो हस्तीनापुर  को उसका  युवराज देने वाला है

ये है महाभारत की अमर कथा का पहला अनलिखा पन्ना  

राजदरबार सावधान हस्तिनापुर नरेश पधार रहे हैं  

महाराज – प्रणाम माते    

भरत – महामंत्री 

महामंत्री – मैं दुष्यंत पुत्र भरत सबसे पहले अपने सूरमाओं  के प्रति अपना आभार प्रकट करना चाहता हूं जिन्होंने हस्तिनापुर को आर्यव्रत की सीमा के अंतिम रेखा तक पहुंचा दिया और मैं आभारी हूं हस्तिनापुर की प्रजा का जिसने  आशीर्वाद के साथ साथ मुझे अपने सपूत  दिए

                     जिनमें से कुछ हमारे साथ लौट नहीं पाए मैं उनके माता पिता को कोटि कोटि प्रणाम करता हूं और आज इस  राज सिहासन से ये  घोषणा करता हूं कि कोई राजा अपने देश और अपने देश के जन समुदाय से बड़ा नहीं होता|

राजा  के केवल 3 कर्तव्य होते हैं देश और जन समुदाय को न्याय देना उनकी रक्षा करना और किसी ऐसे व्यक्ति को युवराज नियुक्त करना जो देश और प्रजा को न्याय भी देख सकें और उनकी रक्षा भी कर सके मुझे खेद है कि मैं अपने किसी पुत्र में  यह गुण नहीं पाता

इसलिए मैं भारद्वाज अभिमन्यु को अपना पुत्र मानकर उसे अपना युवराज नियुक्त करता हूं

mahabharat episode 1

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