br chopra mahabharat online

इस एपिसोड में हम br chopra mahabharat online episode 2 के बारे में जानने की कोशिश करेंगे

br chopra mahabharat online episode – 2

महाभारत एपिसोड 1

मैं समय हूं मेरे बहाव के रास्ते में ना किसी दुख की रुकावट है ना किसी सुख की | फिर भी कभी-कभी भाग्य रेखाएं  मुझे भी उलझा लेती हैं तभी  तो मैं गंगा तट पर शांतनु की वंश रेखा की कथा में  बंधा  खड़ा हूं ब्रह्मा पुत्री गंगा एक-एक करके अपने कोख से जन्म लेने वाले सात शांतनु पुत्रों को स्वयं अपने ही जल में बहा चुकी हैहस्तिनापुर नरेश भी तट पर मेरे साथ खड़े चुपचाप देखते रहने के सिवा कुछ ना कर सके  एक   विवस  मछली की तरह तड़प रहे थे क्योंकि उनके गले में स्वयं उनके वचन  का कांटा फंसा हुआ था वह केवल रो सकते थे तो रोते रहे वह गंगा से कुछ पूछ नहीं सकते थे इसलिए कुछ पूछना सके                

दासिया -अब देखो बहना जन्म लेने वाले आठवें कुमार पर क्या  बीतती है ऐसी मां तो मैंने कभी नहीं देखी मुझसे तो अब महाराज को बधाई भी नहीं दी जाती आश्चर्य तो इस बात का है कि महाराज महारानी से यह भी नहीं पूछते कि इस अनर्थ का क्या कारण है (br chopra mahabharat online)

वे  कैसी मां है जो बच्चे को जन्म देते ही उनकी हत्या कर देती है जब भी साथ में राजकुमार की हत्या करने के लिए गंगा की ओर जा रही थी तो मैं उनके पीछे हो ली हाय कैसे बताऊं

उन्होंने विचारे राजकुमार को पानी में ऐसे रखा जैसे कोई भगवान के चरणों में फूल रखता है बेचारी महारानी जी आठवीं कुमार को भी अवश्य हत्या कर देगी यह लो वो चली

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शांतनु -नहीं नहीं नहीं अब मुझसे यह सहन नहीं होता     

गंगा– आप वचनबद्ध है महाराज      

शांतनु– जिसने तुम्हें बचन दिया था वह एक चंद्रवंशी राजा था और जो तुम्हें रोक रहा है वह एक पिता है तुम एक एक करके मेरे सात बच्चों की हत्या कर चुकी होअब इस आठवें बच्चे को मैं नहीं मरने दूंगा गंगे तुम ऐसा क्यों कर रही हो बोलो क्यों मां होकर अपने बच्चों की हत्या तुम  कैसी मां हो  

गंगा– मैंने इन बच्चों की हत्या नहीं की है महाराज इन्हें श्राप से मुक्त किया है    

शांतनु–  श्राप     

गंगा– हां श्राप महाराज  श्राप में स्वर्ग की रहने वाली ब्रह्मा पुत्री गंगा इस धरती पर भी आपके साथ एक श्राप जी रही हूं और आप मेरे साथ भी एक श्राप जी रहे हैं (br chopra mahabharat online)

  शांतनु– कैसा श्राप किसका  श्राप    

गंगा– मेरे पिता ब्रह्मा का श्राप     

शांतनु– मुझे सारी कथा विस्तार से सुनाओ देवी   

गंगा– पिछले जन्म में आप महाराजा महा भीषक थे और आर्य पुत्र देवराज इन्द्र आपके मित्र थे आप  देवगनाओ का नृत्य देखने के लिए बहुत उनकी सभा में आया करते थे एक दिन जब मैं अपने पिता ब्रह्मा देव के साथ वहां आई तो आप भी वहां थेआपने मुझे देखा और मैंने आपको और देखते ही देखते खो से गए तभी हवा का झोंका आया और उसने मेरा आंचल उड़ा दिया वहां उपस्थित सब देवो ने अपनी अपनी आंखें झुका ली किंतु आप एकटक  मेरी ओर देखते रहे और मैं आपको |  मेरे पिताश्री को क्रोध आ गया उन्होंने हम दोनों को पृथ्वी में जन्म लेने का श्राप दिया (br chopra mahabharat online)

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ब्रह्मदेव– महाभीषक में तुम पर रुठा हूं तुमने शालीनता भंग की और गंगे तुमने महाभीषक  का साथ दिया मैं तुम दोनों को श्राप देता हूं तुम दोनों मृत्यु लोक में जन्म लोगे जाओ मैं तुम दोनों को श्राप देता हूं  

गंगा– और अभी जब आपने अपना वचन तोड़ तो मैं उस श्राप से मुक्त हो गई और उस मुक्ति का अर्थ यह है कि मेरे लिए अब आप को छोड़कर जाने का समय आ गया है

शांतनु– परंतु क्या वह मेरे सातों पुत्र  भी देवताओं के चौसर की गोटिया थी  

  गंगा – मन मेला ना कीजिए आर्यपुत्र आप के आठों पुत्र वो बसु हैं जिन्हें ऋषि वशिष्ठ ने धरती में जन्म लेने का श्राप दिया था उसे उनका यह दुख देखा ना गया तो मैंने उन्हें वचन दिया कि मैं उन्हें अपनी कोख से जन्म दूंगी और जन्म देने के बाद उन्हें मृत्युलोक से मुक्ति दिलाने परंतु लगता है कि अभी यह उस श्रॉफ की अंतिम सीमा तक नहीं पहुंचा इसे अभी वह सिर्फ जीना है अच्छा आज्ञा दीजिए आर्य पुत्र

शांतनु– परंतु मेरे पुत्र को तो मुझे देती जाओ प्रिय

गंगा–  अभी इसका समय नहीं आया है मैं इसे अपने साथ ले जा रही हूं समय आने पर इसे लौटा दूंगी मैंने इसका नाम देव व्रत रखा है आर्यपुत्र परंतु आगे चलके धरती और आकाश के बीच ना जाने इसका  नाम क्या हो जाए (br chopra mahabharat)  

गंगा के जाने के पश्चात शांतनु का जीवन जैसे अर्थहीन हो गया है उसकी दिशाएं खो गई पानी चला गया खाली गागर रह गई और रह गई दर्शन की प्यास जब यह प्यास बहुत सताती तो वे तट पर चले जाते और  उस की लहरों में अपनी गंगा को खोजने लगते   

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शांतनु– चलो सारथी    

सारथी– किस दिशा में ले चलूं महाराज   

शांतनु– जिस दिशा में चलने को तुम्हारा जी चाहे (बच्चों के रोने की आवाज) शांतनु यह ये म्रगछाला ये कमण्डल ये तो किसी ऋषि के वंश के अंकुर लगते हैं सारथी       

सारथी– परंतु ऋषि इन्हें यहां क्यों छोड़ जाएंगे महाराज    

शांतनु –   सारथी हम और तुम तो एक साधारण व्यक्ति हैं और कोई साधारण व्यक्ति ऋषि यों के कार्यों की क्या समझेगा उनकी कृपा की भाषा का अर्थ क्या जानेगा यह ऋषि की कृपा है इसीलिए मैं तुम्हें कृपया ही पुकारूंगा (br chopra mahabharat online)  

सारथी– परंतु ऋषि पुत्री को क्या कहेंगे महाराज    

महाराज – यदि भाईकृपा है तो बहन कृपी  ही हो सकती है        

राजगुरु– आइए राजन

महाराज– आप इन के विषय में कुछ नहीं पूछेंगे     

राजगुरु– में पूछने के लिए नहीं राजन बताने के लिए उसने तो स्वयं आप आए हैं 

   महाराज – जीवन की  यह दो कोपले  मुझे वन में पड़ी मिली इनके सिराने कमंडल था और नीचे मृगशाला वहां आसपास और कोई नहीं था राजगुरु इसलिए मैंने  अनाथों  को अपनी शरण में ले लिया 

राजगुरु– नाथ के होते हुए कोई अनाथ कैसे हो सकता है राजन भगवान कब किसके हाथ को अपना हाथ बना लेते हैं कोई नहीं जानता भगवान कब किसकी आंखों से किसे देख लेते हैं पता नहीं वह कब किसके  पैरों से चलकर किसके पास जाते हैं यह केवल वही जानते हैं(

तो आप  यह समझिए राजन की इस बालक और इस बालिका को भगवान ने आपकी आंखों से देखा है और  स्वयं आपके पैरों से चलकर इनके पास गए हैं और आपके हाथों से उठा कर इन्हें अपनी गोद में रख लिया आप इन्हें महादेव का प्रसाद मानिए राजन और अपने सूने  संतान रहित जीवन का मन बहलाइये

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महाराज– मेरे जीवन को संतान रहित ना कहिए राजगुरु आप तो जानते हैं कि गंगा  मेरे आठवें पुत्र को मुझे लौटा देने का वचन देकर गई है मैं अपने उसी पुत्र की प्रतीक्षा कर रहा हूं मैं इनके साथ न्याय नहीं कर सकूंगा राजा हूं इसलिए जानबूझकर इनके साथ अन्याय भी तो नहीं कर सकता यह किसी ऋषि की धरोहर है इन्हें आप ही संभालिए क्योंकि मेरा जीवन तो राजभवन से गंगा तट तक आने जाने में वित्त रहा है

इसी आने-जाने बिरह की अग्नि में जलने और गंगा की प्रतीक्षा में 16 वर्ष बीत गए परंतु एक दिन जब वे अपनी व्याकुलता की अंजलि भरे राजभवन की एक खिड़की से गंगा  को ताक रहे थे तो शांतनु ने देखा कि तीरों की एक बाण ने शक्तिशाली गंगा को बांध दिया है उनकी तिरियों पर बल पड़े उन्होंने  कंधे से धनुष लिया धनुष मेंबाण लगाया और कमान खींची ही थी कि गंगा प्रकट हुई 

गंगा– आर्यपुत्र     

शांतनु– गंगे तो तुम्हें मुझ पर दया आ ही गई  (br chopra mahabharat online) 

गंगा– कैसे हैं महाराज   

शांतनु – आत्मा बिना शरीर कैसा हो सकता है प्रिय अब और देर ना करो | गंगा के पानी को मुक्ति दिलाकर हम राजभवन चलते हैं जो तुम्हारे बिना ऐसा लगता है जैसे दीप बिना  दिवाली की रात गुलाल बिन होली का दिन हम एक बार फिर से सुखचैन का वही जीवन जिएंगे प्रिय     

गंगा– बहता हुआ पानी का भी लौटा है आर्यपुत्र जो मैं लौट आऊंगी अतीत कभी वर्तमान नहीं बन सकता आपका अतीत हूं और आपका भविष्य आपको लौटाने आई हूं       

शांतनु–  तुम्हारे बिना मेरा कोई भविष्य नहीं  हे प्रिय 

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गंगा– आर्यपुत्र है और मैं आपका भविष्य अपने साथ लेकर आई हूं क्योंकि वास्तव में भविष्य अतीत की कोख से ही जन्म लेता है वह रहा आपका भविष्य देवव्रत मां मां मां देखो आज मैंने नदी को फिर से रोक दिया था

गंगा– हां पुत्र मैंने भी देखा और तुम्हारे पिता महाराज ने भी     

देवव्रत– पिता महाराज    

गंगा– देख क्या रहे हैं महाराज अपने पुत्र को संभालिए पुत्र अपने पिता महाराज को प्रणाम करो    

शांतनु– तुम्हारा नाम क्या है पुत्र    

देवव्रत– मां ने मेरा नाम देव व्रत रखा है शांतनु  धनुर्विद्या किससे सीखी है     

देवव्रत– ऋषि भार्गव से पिता महाराज

गंगा– आप क्या समझे थे आर्यपुत्र कि मेरी ममता पुत्र प्रेम में अंधी होकर इसे युवराज कह गई मुझे भरतवंशियों की इस परंपरा का ज्ञान है कि वह जन्म में नहीं कर्म में विश्वास करते हैं कि वह जन्म भोगी नहीं कर्म योगी होते हैं    

शांतनु– मेरे और तुम्हारे पुत्र को योग्य तो होना ही चाहिए प्रिय      

गंगा यह आवश्यक नहीं था आर्यपुत्र परंतु हस्तिनापुर की राजगद्दी पर कर्म का ही अधिकार चला आ रहा है इसलिए मैंने आवश्यक समझा कि देवव्रत ऋषि वशिष्ठ से वेद और वेदांत की शिक्षा प्राप्त करें और गुरु  बृहस्पति से राजनीति सीखे

जो इसने किया और जब ऋषि भार्गव ने यह कह दिया कि अब त्रिलोक में इस बालक के   बानो का सामना कोई नहीं कर सकता तो मैंने सोचा कि अब समय आ गया है कि हस्तिनापुर को उसका युवराज लौटा दिया जाए 

और अच्छे से जानने क लिए आगे पढ़े (br chopra mahabharat online)

शांतनु– गंगे हस्तिनापुर इसे पाकर धन्य हो गया    

गंगा– अब तुम अपने पिता महाराज के साथ हस्तिनापुर जाओ जहां इतिहास तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है      

देवव्रत– और आप माते 

गंगा– वृक्ष की छाया वृक्ष से बंधी होती है वह चाह कर भी यात्री के साथ आगे नहीं जा सकती तुम्हारे लिए मैं भी एक ऐसी ही छाया है समय के वृक्ष से बंधे हुए अब तुम अपने पिता महाराज के साथ जाओ और हस्तिनापुर में अपने कर्तव्यों का पालन करो      

देवव्रत– जो आज्ञा माते    

गंगा– अच्छा आर्यपुत्र चलती हूं     

शांतनु– प्रिय  

शांतनु– उदास ना हो पुत्र

देवव्रत– में अपने अधूरे पन पर उदास हूं पिता महाराज की माता और पिता का स्नेह मुझे कभी एक साथ नहीं मिला शांतनु  मैं तुम्हें माता और पिता दोनों का स्नेह देने का प्रयास करूंगा हां आओ चलें    

शांतनु– इन्हे प्रणाम करो पुत्र यह हमारे सार्थी  ही नहीं मित्र भी हैं    

देवव्रत सारथी का मित्र होना आवश्यक है     

सारथी– राजकुमार की जय हो देवव्रत जय बोलना  ही है  तो हस्तिनापुर राज की जय बोलो क्योंकि राज राजा राजकुमार दोनों से बड़ा होता है               

शांतनु– परंतु वत्स तुम्हें तो तुम्हारी माता ने विद्या धनी बनाकर हमारे पास भेजा है    

देवव्रत– विद्यार्थी तो सदा विद्यार्थी ही होता है पिता श्री विद्या धनी तो केवल भगवान है विद्यार्थी तो केवल विद्या का प्रसाद ही पाता है      

शांतनु– तो फिर यह प्रसाद हमसे बांटो पुत्र  

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https://youtu.be/l8XlYCxEK9Q
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